Parsi Religion- सायरस मिस्त्री का अंतिम संस्कार

टाटा संस के फॉर्मर चेयरमैन साइरस मिस्त्री की महाराष्ट्र के पालघर में कार ऐक्सिडेंट में मौत हो गई.

सायरस मिस्त्री भारत में पारसी समुदाय का एक बड़ा चेहरा थे, और अब उनके अंतिम संस्कार के लिए दूसरे देशों से भी उनके रिश्तेदार आ रहे हैं, इस वजह से साइरस का अंतिम संस्कार 5 सितंबर की बजाय 6 सितंबर को किया जा रहा है. रिपोर्ट्स की मानें तो मुंबई के वर्ली के इलेक्ट्रिक शव दाह गृह या वाले स्थित टावर ऑफ साइलेंस में उनका अंतिम संस्कार किया जा सकता है। लेकिन क्या आपको पता है कि पारसी समुदाय का अंतिम संस्कार करने का तरीका बिल्कुल अलग है.

Parsi Religion – ना शव को जलाते हैं ना दफनाते हैं

जिन्हे नहीं पता उन्हें बता दें कि हजारों साल पहले पार से यानी पर्शिया ईरान से भारत आये थे. इस दाब में कुछ रीती रिवाज बिल्कुल अलग है खास तौर पर इनके अंतिम संस्कार करने का तरीका, जैसा की हमने बताया कि इस धर्म में शव को हिंदू धर्म की तरह ना तो जलाया जाता है, ना ही इस्लाम धर्म की तरह दफनाया जाता है। दरअसल पारसी समुदाय में माना जाता है कि मृत शरीर अशुद्ध होता है. और इसे जलाना दफनाना ये पानी में बहाना प्रकृति को गंदा करने जैसा है.

बता दें कि पारसी धर्म में पृथ्वी जल और अग्नि इन तीनों को ही बहुत पवित्र माना गया है, इसीलिए पारसी लोग शवों को न तो जलाते है, ना ही दफनाते हैं, और ना ही पानी में बहते हैं, बल्कि शवों को सूरज की किरणों के सामने टावर ऑफ साइलेंस के ऊपर रख दिया जाता है. बता दें कि टावर ऑफ साइलेंस को आम भाषा में दखमा भी कहा जाता है टावर ऑफ साइलेंस एक गोलाकार होता है, जिसके ऊपर ले जाकर शव को सूरज की रौशनी में रख दिया जाता है यहाँ चील और कौआ आकर खा जाते है.

गिद्धों का शवों को खाना पारसी धर्म समुदाय में एक रिवाज है, लेकिन भारत के कई शहरों में किंतु की संख्या कम होने के चलते पारसी समुदाय को अब अंतिम संस्कार के लिए परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. क्योंकि पहले जो काम कुछ घंटों में ही कर लेते थे उसे अब करने में कई कई दिन लग जाते हैं इससे कई दिनों तक शव सड़ते रहते हैं और इनमे से दुर्गंध आने लगती है.

Use of सोलर कॉन्सन्ट्रेटर

अब ऐसे में कुछ पारसी लोग भारत के कई हिस्सों में शवों को जल्दी गलाने के लिए सोलर कॉन्सन्ट्रेटर का सहारा भी ले रहे हैं, लेकिन ये तरीका सही नहीं है.

खबरों की मानें पिछले कुछ सालों में कुछ पारसी लोग अपने निवास को छोड़कर शवों को जलाकर अंतिम संस्कार भी कर रहे हैं. ये लोग शवों को अब टावर ऑफ साइलेंस के ऊपर नहीं रखते हैं बल्कि हिंदू धर्म की तरह श्मशान घाट या फिर विद्युत शवदाह यानी इलेक्ट्रिक क्रिमेटोरियम में ले जाते हैं.

बता दें कि टावर ऑफ साइलेंस में शव को रखने के बाद चार दिनों तक उस इंसान की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना के लिए पूजा की जाती है, लेकिन अगर किसी पारसी इंसान के शव जलाया या दफना दिया जाता है तो उसके लिए प्रार्थना नहीं की जाती है, क्योंकि पारसी समुदाय में इसे टैबू माना जाता है.

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